Katha (Story)
एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर जीवनयापन करती थी। एक दिन मार्ग में उसे एक घायल राजकुमार मिला, जिसे वह अपने घर ले आई और सेवा-शुश्रूषा करने लगी। संयोगवश उसी नगर की राजकुमारी भी अपने मित्रों सहित वहां आ पहुंची और दोनों राजकुमार-राजकुमारी में प्रेम हो गया। एक दिन गंधर्वराज के पुत्र ने उस राजकुमार का अपहरण कर लिया। दुखी ब्राह्मणी और राजकुमारी ने शिवजी की शरण ली और विधिपूर्वक त्रयोदशी तिथि को प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद व रात्रि से पहले का समय) में शिव-पार्वती का व्रत व पूजन किया। भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनकी कृपा से राजकुमार सकुशल लौट आया तथा उसका खोया हुआ राज्य भी पुनः प्राप्त हुआ। इसी कथा के आधार पर प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखने की परंपरा है, जो संकट दूर करने और मनोकामना पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
Significance
This katha of a poor Brahmin widow and a princess whose devoted Pradosh (twilight) worship of Shiva-Parvati brought a lost prince safely home and restored his kingdom illustrates the power of the Trayodashi Pradosh fast.
How the Vrat Is Observed
Observed on the Trayodashi (13th) tithi of each lunar fortnight during the Pradosh Kaal (twilight period), with Shiva puja performed at dusk — believed to remove obstacles and grant wishes.