Katha (Story)
एक नगर में एक धनी सेठ रहता था जिसके कोई संतान नहीं थी। वह प्रतिदिन शिव मंदिर में जाकर सोमवार का व्रत रखता और भगवान शिव से संतान का वरदान मांगता। भगवान शिव और देवी पार्वती उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए। देवी पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि सेठ को पुत्र का वरदान दें, परंतु शिव जी ने कहा कि सेठ के भाग्य में संतान नहीं है, फिर भी पार्वती के आग्रह पर उन्होंने अल्पायु पुत्र का वरदान दे दिया। सेठ के घर पुत्र का जन्म हुआ, परंतु ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि पुत्र केवल बारह वर्ष तक जीवित रहेगा। सेठ ने पुत्र के बड़े होने पर उसे काशी विद्याध्ययन हेतु भेजा, साथ ही यज्ञोपवीत संस्कार के बहाने कुछ धन और वस्त्र भी भेजे, जिनसे मार्ग में उसने एक ब्राह्मण कन्या के विवाह में सहायता की। इसी पुण्य कर्म और सोमवार व्रत के प्रभाव से यमदूत भी उसके प्राण नहीं ले सके, और सेठ के पुत्र की आयु बढ़ गई। इस प्रकार सोमवार व्रत की महिमा से भगवान शिव अपने भक्तों की अकाल मृत्यु तक को टाल देते हैं।
Significance
This katha of a childless merchant who received a son through Shiva's grace (via Parvati's intercession) and how that son's life, destined to be short, was extended through the merit of charitable deeds and continued devotion, illustrates the protective power of the Monday fast dedicated to Shiva.
How the Vrat Is Observed
Observed every Monday with a fast (often taking only one meal), worship of Shiva with Bel leaves, milk and water, and recitation of the katha — believed to grant health, marital happiness and fulfillment of wishes.